महासमुंद: कलेक्टर की 'सुस्त' प्रशासनिक व्यवस्था से जनता बेहाल, : जनदर्शन और शिकायतों पर सिर्फ मिल रहा आश्वासन
फिरोज खान संभाग प्रमुख रायपुर
Tue, May 26, 2026
जिले में चरमराई प्रशासनिक व्यवस्था: जनहित के मुद्दे ठंडे बस्ते में, जिम्मेदार मौन
छत्तीसगढ़/महासमुंद
महासमुंद जिले के प्रशासनिक मुखिया के तौर पर कमान संभालने के बाद से ही आम जनता को राहत मिलने की उम्मीदें अब पूरी तरह से काफूर होती नजर आ रही हैं। जिले में प्रशासनिक ढर्रा इस कदर लचर हो चुका है कि आम आदमी अपनी जायज मांगों और शिकायतों को लेकर दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है।
जमीनी हकीकत यह है कि कलेक्टर कार्यालय में आयोजित होने वाले 'जनदर्शन' से लेकर ऑनलाइन शिकायत पोर्टलों (जैसे जन शिकायत निवारण और CPGRAMS) पर आने वाले गंभीर मामलों को अधिकारी ठंडे बस्ते में डाल रहे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि जिले के सर्वोच्च अधिकारी का इन लापरवाह मातहतों पर कोई प्रशासनिक नियंत्रण दिखाई नहीं दे रहा है।
अधूरे वादे और लंबित फाइलें बनीं जी का जंजाल
जनता का आरोप है कि चाहे वह किसानों के मुआवजे का मामला हो, जमीनों के अवैध नामांतरण/डायवर्जन की शिकायतें हों, या फिर विभिन्न विभागों में चल रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच की मांग—कलेक्टर की टेबल तक पहुंचने के बाद फाइलें रेंग रही हैं। निचले अधिकारियों की सुस्ती का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। कई महत्वपूर्ण मामलों में जांच रिपोर्ट महीनों से लंबित है, जिससे साफ जाहिर होता है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति का पूरी तरह अभाव है।
निचले अधिकारियों की मनमानी चरम पर
कलेक्टर की इस शिथिल कार्यप्रणाली का सीधा फायदा निचले स्तर के अधिकारी उठा रहे हैं। फरियादियों का कहना है कि जब जिले के मुखिया ही गंभीर मामलों पर कड़ा रुख नहीं अपना रहे हैं, तो अन्य विभागों के कर्मचारी निरंकुश होकर काम कर रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ की गई शिकायतें महीनों तक धूल खाती रहती हैं और अंत में बिना किसी ठोस कार्रवाई के कागजों पर 'नस्तीबद्ध' (बंद) कर दी जाती हैं।
जमीनी हकीकत: इन 3 बड़े मामलों ने खोली प्रशासन की पोल
जिले में प्रशासनिक संवेदनहीनता और लापरवाही को इन तीन प्रमुख उदाहरणों से समझा जा सकता है:
1. गौरव पथ की 'खूनी क्रॉसिंग': पूंजीपतियों को लाभ, जनता को मौत
मनोज गहरेवाल (पार्षद, वार्ड नंबर 01, नगर पंचायत बसना):
"प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों की मनमानी का खामियाजा आम जनता को अपनी जान गंवाकर भुगतना पड़ रहा है। करोड़ों की लागत से बने गौरव पथ के डिवाइडर पर नियमों को दरकिनार कर, पूंजीपति वर्ग को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से जगह-जगह अवैध क्रॉसिंग बना दी गई है। इन कट्स की वजह से राहगीर लगातार सड़क दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं और कई लोगों की मौत हो चुकी है। लगातार मांग के बाद भी इन अनुचित क्रॉसिंग को व्यवस्थित न करना प्रशासन को सवालों के घेरे में खड़ा करता है।"
2. फर्जी अनुकंपा नियुक्ति का महा-घोटाला अब तक दबा
फिरोज खान
"क्या आम जनता को हर छोटी-बड़ी शिकायत की जांच करवाने के लिए माननीय उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा? क्या जिला प्रशासन से उम्मीद लगाना ही बेकार है? महासमुंद जिले में वर्ष 2025 से आज तक का बहुचर्चित 'संत लाल मुखर्जी (प्रधान पाठक, गौरटेक) का फर्जी अनुकम्पा नियुक्ति' का मामला अब तक ठंडे बस्ते में पड़ा है। मीडिया में लगातार खबरें चलने के बाद भी अधिकारियों के कान में जूं तक नहीं रेंग रही। कलेक्टर को इस पर तत्काल संज्ञान लेना था, लेकिन मामला दबा हुआ है। आखिर गरीब जनता जाए तो जाए कहां?"
3. खाद की कालाबाजारी: स्टिंग वीडियो के बाद भी लीपापोती
महेंद्र साव (किसान नेता):
"किसानों के हक पर डाका डालने वाले व्यापारियों का जब स्टिंग वीडियो सामने आया, तब भी प्रशासन ने ठोस कार्रवाई करने के बजाय मामले में लीपापोती कर दी। यूरिया खाद की कालाबाजारी करने वाले माफियाओं को अभयदान देना बसना अंचल के मेहनतकश किसानों के साथ सरासर अन्याय है। शासन-प्रशासन पूरी तरह किसान विरोधी रवैया अपनाए हुए है।"
बड़े सवाल: जवाबदेह कौन?
सवाल 01: क्या महासमुंद जिला प्रशासन सिर्फ कागजी दावों और आश्वासनों तक सीमित रह गया है?
सवाल 02: नियमों को ताक पर रखकर गौरव पथ पर अवैध क्रॉसिंग देने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?
सवाल 03: फर्जी अनुकंपा नियुक्ति और खाद कालाबाजारी के दोषियों को किसका संरक्षण प्राप्त है, जो महीनों बाद भी फाइलें आगे नहीं बढ़ रही हैं?
निष्कर्ष: महासमुंद जिले में जनहित के मुद्दे पूरी तरह हाशिए पर चले गए हैं। यदि जिला कलेक्टर ने जल्द ही अपने मातहत अधिकारियों पर नकेल नहीं कसी और लंबित मामलों का निपटारा नहीं किया, तो जनता का इस व्यवस्था से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा।
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