छत्तीसगढ़- प्रदेश में हरा सोना की खरीदी पर पड़ पर सकता है प्रभाव? : महासमुंद /पिथौरा- अपनी मांगों को लेकर प्रबंधकों की हड़ताल जारी
फिरोज खान संभाग प्रमुख रायपुर
Mon, Apr 27, 2026
प्रबंधकों की अनिश्चितकालीन हड़ताल से छत्तीसगढ़ की तेंदूपत्ता व्यवस्था ठप!
65 लाख संग्राहकों की रोजी-रोटी पर भारी संकट,
शासन के अनदेखी से हो सकता है करोड़ों का नुकसान,
पिथौरा – छत्तीसगढ़ की वन संपदा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली तेंदूपत्ता व्यवस्था पूरी तरह से ठप पड़ गई है। राज्य के 902 लघु वनोपज प्रबंधक 22 अप्रैल से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं और आज हड़ताल का छठा दिन चल रहा है। प्रबंधक संघ के आंदोलन ने प्रशासन की नींद उड़ा दी है क्योंकि 14 लाख तेंदूपत्ता संग्राहक परिवारों और 65 लाख से ज्यादा ग्रामीणों की आजीविका सीधे खतरे में पड़ गई है।
प्रदेश अध्यक्ष सन्नी साहू ने साफ चेतावनी दी है – “38 साल से हो रहा घोर अन्याय अब बर्दाश्त नहीं होगा। बार-बार ज्ञापन देने के बावजूद सरकार ने आंखें मूंद रखी हैं। अब आर-पार की लड़ाई है। प्रबंधक अपनी हक की लड़ाई लड़ेंगे और अधिकार लेकर ही मानेंगे।”
38 साल का लंबा अन्याय, अब आग बबूला प्रबंधक
प्रबंधक पिछले 38 वर्षों से सुदूर वनांचलों में दिन-रात मेहनत कर तेंदूपत्ता संग्रहण, 67 प्रकार के लघु वनोपज की खरीदी, बोनस वितरण, बीमा योजनाएं और जनकल्याणकारी कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक चला रहे हैं। लेकिन बदले में उन्हें क्या मिला?
नियमित कर्मचारी का दर्जा नहीं
उचित वेतनमान (लेवल 07, 08, 09) नहीं
पेंशन, मेडिकल सुविधा, सेवा सुरक्षा जैसी बुनियादी चीजें भी नहीं
बार-बार लिखित ज्ञापन, बैठकें और निवेदन के बावजूद शासन-प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अब प्रबंधकों का गुस्सा फूट पड़ा है और वे पूरी तरह “आर-पार” के मूड में हैं।
हड़ताल का भयावह असर – लाखों परिवार बर्बादी के कगार पर
हड़ताल के कारण पूरे प्रदेश में तेंदूपत्ता संग्रहण प्रक्रिया लगभग रुक चुकी है। पिछले साल 2025 में सिर्फ तेंदूपत्ता से संग्राहकों के खातों में करीब 700 करोड़ रुपये सीधे ट्रांसफर किए गए थे। इस बार 95% फड़ों पर संग्रहण शुरू ही नहीं हो पाया है।
महासमुंद जिले में 1 मई से तेंदूपत्ता खरीदी शुरू होने वाली थी, लेकिन हड़ताल के चलते यहां के करीब 1 लाख ग्रामीण परिवार अब भारी आर्थिक संकट में फंस गए हैं। पूरे राज्य में 14 लाख परिवार और 65 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हो रहे हैं। अगर हड़ताल लंबी खिंची तो करोड़ों रुपये का नुकसान तय है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा जाएगी।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
प्रबंधक संघ ने स्पष्ट कहा है कि इस पूरे संकट की जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी। बार-बार चेतावनी देने के बावजूद अगर सरकार अभी भी नहीं जागी तो आंदोलन और ज्यादा उग्र रूप लेगा।
सन्नी साहू ने कहा, “हम अपनी मांगें पूरी करवाकर ही हड़ताल समाप्त करेंगे। नियमितीकरण, उचित वेतन मैट्रिक्स, पेंशन, अनुकंपा नियुक्ति और लंबित भुगतान – ये सब मुद्दे जल्द से जल्द सुलझाए जाएं, वरना स्थिति और बिगड़ने वाली है।”
क्या करेगी सरकार?
अब सवाल ये है कि छत्तीसगढ़ सरकार इस गंभीर संकट को कितनी जल्दी समझती है और प्रबंधकों की जायज मांगों को मानती है या नहीं। लाखों गरीब वनवासियों की रोजी-रोटी और प्रदेश की वनोपज अर्थव्यवस्था दांव पर लगी हुई है।
प्रबंधकों की यह हड़ताल सिर्फ अपनी अधिकार की लड़ाई नहीं, बल्कि पूरे ग्रामीण छत्तीसगढ़ की आजीविका की लड़ाई बन चुकी है।
अब देखना होगा कि प्रशासन कब तक अपनी “चुप्पी की नीति” जारी रखेगा और कब तक लाखों परिवारों को इस अनिश्चितता में झुलसने देगा।
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